वाराणसी/चंदौली : चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन देवी माँ कूष्मांडा को समर्पित है। मान्यता है कि जब चारों ओर अंधकार ही अंधकार था, तब माँ ने एक हल्की सी मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की रचना कर दी। यही कारण है कि उन्हें “आदि सृष्टिकर्ता” भी कहा जाता है।
क्या आप जानते हैं?
कहा जाता है कि जिस घर में इस दिन सच्चे मन से माँ की पूजा होती है, वहां नकारात्मक ऊर्जा अपने आप समाप्त हो जाती है और सुख-समृद्धि का वास होता है।
माँ कूष्मांडा का दिव्य स्वरूप
माँ कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी के रूप में पूजा जाता है। उनके आठ हाथों में अलग-अलग दिव्य अस्त्र-शस्त्र और अमृत कलश होता है। उनका वाहन सिंह है, जो शक्ति, साहस और निर्भयता का प्रतीक है।
विशेष रहस्य:
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि माँ सूर्य मंडल के अंदर निवास करती हैं और वहीं से पूरे ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करती हैं।
पूजा विधि (ऐसे करें तो मिलेगा विशेष फल)
- सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें
- पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें
- माँ की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
- दीप, धूप, पुष्प और अक्षत अर्पित करें
- कद्दू (कूष्मांड) और मालपुआ का भोग लगाएं
- “ॐ देवी कूष्मांडायै नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें
👉 टिप: पूजा के बाद प्रसाद घर के सभी सदस्यों में बांटें — इससे परिवार में एकता और प्रेम बढ़ता है।
भोग, रंग और शुभ संकेत
- भोग: मालपुआ, कद्दू, शहद
- शुभ रंग: नारंगी (ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक)
🟠 इस दिन नारंगी रंग पहनना बेहद शुभ माना जाता है और यह सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।
चमत्कारी लाभ (लोक मान्यता)
- रोगों से मुक्ति और अच्छी सेहत
- धन और ऐश्वर्य में वृद्धि
- मानसिक तनाव से राहत
- घर में सुख-शांति और समृद्धि
दिलचस्प बात:
कई श्रद्धालुओं का मानना है कि इस दिन माँ से मांगी गई मनोकामना जल्दी पूरी होती है, खासकर यदि पूजा पूरे विधि-विधान से की जाए।
नवरात्रि का चौथा दिन सिर्फ पूजा का नहीं, बल्कि अपने जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर है। अगर आप सच्चे मन से माँ कूष्मांडा की आराधना करते हैं, तो माना जाता है कि आपके जीवन के अंधकार भी उसी तरह दूर हो सकते हैं, जैसे माँ ने सृष्टि का अंधकार मिटाया था।