वाराणसी। पितरों के स्मरण और तर्पण का पर्व पितृपक्ष 2026 इस बार 27 सितंबर से शुरू होगा और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ संपन्न होगा। पितृपक्ष शुरू होने से पहले ही काशी में पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध कराने के लिए श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया है। वाराणसी के पिशाचमोचन कुंड समेत गंगा के प्रमुख घाटों पर इस दौरान विशेष धार्मिक गतिविधियां देखने को मिलती हैं।

पंचांग के अनुसार पितृपक्ष की प्रतिपदा का श्राद्ध 27 सितंबर को होगा। इसके बाद मृत्यु की संबंधित हिंदू तिथि के अनुसार परिवार अपने पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण करेंगे। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृपक्ष का समापन होगा। इस दिन उन पितरों के लिए भी श्राद्ध-तर्पण करने की परंपरा है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका निर्धारित तिथि पर श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो सका।

काशी में पिशाचमोचन कुंड का विशेष महत्व

पितृपक्ष के दौरान वाराणसी का पिशाचमोचन कुंड प्रमुख श्राद्ध स्थलों में शामिल रहता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां विशेष रूप से अकाल या असामयिक मृत्यु से जुड़े मामलों में त्रिपिंडी श्राद्ध और अन्य पितृ कर्म कराए जाते हैं। पितृपक्ष शुरू होने से पहले ही यहां श्रद्धालुओं के पहुंचने की तस्वीरें सामने आई हैं।

काशी की परंपरा में पिशाचमोचन कुंड का संबंध त्रिपिंडी श्राद्ध से विशेष रूप से बताया जाता है। हालांकि किस परिवार को कौन-सा कर्मकांड करना चाहिए, यह मृतक की स्थिति, पारिवारिक परंपरा और स्थानीय आचार्य के मार्गदर्शन के अनुसार तय किया जाता है।

गंगा घाटों पर भी होगा तर्पण

पितृपक्ष में काशी के गंगा घाटों पर भी तर्पण और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट और अस्सी घाट समेत अलग-अलग घाटों पर श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त जल और तिल अर्पित करते हैं। स्थानीय परंपरा में पितृ कर्म के लिए काशी के घाटों का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।

तर्पण कैसे किया जाता है?

सामान्य तर्पण में स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पितरों का स्मरण किया जाता है। परंपरा के अनुसार जल में काले तिल और कुश का प्रयोग करते हुए पितरों को जल अर्पित किया जाता है। गोत्र और पूर्वजों के नाम ज्ञात होने पर संकल्प में उनका उल्लेख किया जाता है।

हालांकि श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण की विधि सभी परिवारों में एक जैसी नहीं होती। इसलिए विस्तृत कर्मकांड के लिए अपने पारिवारिक पुरोहित या स्थानीय आचार्य से विधि और तिथि की पुष्टि करना उचित रहेगा।

पितृपक्ष में क्या करें, क्या न करें?

पितृपक्ष में पितरों का स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करने की परंपरा है। जरूरतमंदों को भोजन कराने, अन्न-वस्त्र दान करने और जीव-जंतुओं को भोजन देने जैसी परंपराएं भी कई परिवारों में प्रचलित हैं।

वहीं, कई परिवार इस अवधि में मांसाहार, मद्यपान और अनावश्यक भोग-विलास से परहेज करते हैं। मांगलिक आयोजनों को टालने की परंपरा भी कई समुदायों में है। इन नियमों में क्षेत्र, संप्रदाय और परिवार की परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है।

काशी में बढ़ रहा है डिजिटल तर्पण का चलन

पितृपक्ष के साथ काशी में एक नया बदलाव भी देखने को मिल रहा है। वाराणसी में विदेशों और दूसरे शहरों में रहने वाले लोग वीडियो कॉल और डिजिटल माध्यमों के जरिए भी श्राद्ध और तर्पण कर्म से जुड़ रहे हैं। हालिया रिपोर्ट के अनुसार कुछ कर्मकांडी समूह एनआरआई श्रद्धालुओं के लिए ऑनलाइन तर्पण और पिंडदान की व्यवस्था कर रहे हैं।

इससे काशी की सदियों पुरानी पितृ परंपरा आधुनिक तकनीक से भी जुड़ती दिखाई दे रही है। हालांकि ऑनलाइन कर्मकांड को लेकर परिवारों की धार्मिक मान्यता और आचार्य की सलाह अलग-अलग हो सकती है।

10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या

पितृपक्ष का अंतिम और महत्वपूर्ण दिन 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या होगी। इस दिन उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है अथवा जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया।

काशी में इस दिन गंगा घाटों और पिशाचमोचन जैसे प्रमुख पितृ तीर्थों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ सकती है। इसलिए बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को यात्रा, पुरोहित और कर्मकांड की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित करने की सलाह दी जाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष भय का नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।